Class 10 Hindi Chapter 4 आत्मकथ्य NCERT Notes and Solution

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आत्मकथ्य

पाठ की रूपरेखा 

मुंशी प्रेमचंद के संपादन में निकलने वाली तत्कालीन पत्रिका हंस के आत्मकथा विशेषांक हेतु सुप्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद से भी आत्मकथा लिखने के लिए कहा गया। लोगों के कहने पर भी वे आत्मकथा लिखना नहीं चाहते थे, क्योंकि उन्हें अपने जीवन में ऐसा कुछ विशेष नज़र नहीं आता था, जिसे वे दूसरों के सामने रख सकें। इसी असहमति के तर्क (विचार) से पैदा हुई कविता है ‘आत्मकथ्य’।

यह कविता पहली बार वर्ष 1932 में ‘हंस’ के आत्मकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। कवि ने इस कविता को छायावादी शैली में लिखा है। कवि ने अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए खड़ी बोली तथा ललित, सुंदर एवं नवीन शब्दों का प्रयोग किया है। कवि ने इसमें स्वयं को एक साधारण व्यक्ति माना है, जिसमें ऐसा कुछ भी महान्‌ एवं रोचक नहीं है, जिससे लोग प्रेरित हों और सुख प्राप्त कर सकें । यह दृष्टिकोण महान्‌ कवि की विनम्रता को प्रदर्शित करता है।

कवि-परिचय 

हिंदी साहित्य के छायावाद के आधार स्तंभ कवि जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई. में वाराणसी में हुआ। इनकी शिक्षा आठवीं कक्षा से आगे नहीं हो पाई थी, जिसके कारण इन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फ़ारसी आदि भाषाओं का अध्ययन किया। आठ वर्ष की आयु में उनकी आँखों के समक्ष उनके माता-पिता व बड़े भाई का निधन हो गया। इन सभी कष्टों को झेलते हुए वे काव्य-रचना करने लगे।

जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं हैं :-

चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आँसू, लहर, कामायनी (काव्य); चंद्रग॒प्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री (नाटक); कंकाल, तितली, इरावती (उपन्यास) ; छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल (कहानी-संग्रह)। छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने हिंदी को एक नई दिशा प्रदान की। उनकी भाषा सरल, सहज है, जो छोटे-छोटे वाक्यों में गंभीर भाव प्रकट करती है। उनकी भाषा-शैली ओज ब माधुर्य गुण से ओत-प्रोत है। प्रकृति-प्रेम, देश-प्रेम उनके काव्य की विशेषता है। उनका निधन वर्ष 1937 में हुआ।

काव्यांश 1 

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास

तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

भावार्थ

कवि जयशंकर प्रसाद भौंरे के माध्यम से अपनी कथा का उल्लेख करते कहते हैं कि हे मन रूपी भौंरे गुन-गुनाकर अपनी कौन-सी कहानी कह रहा है? कवि के जीवन की इच्छाएँ उचित वातावरण न पाकर मुरझाकर गिर रही हैं अथांत्‌ उसके जीवन को सुख पहुँचाने वाली खुशियाँ एक-एक करके उसका साथ छोड़कर चली गई हैं।इस विशाल विस्तार वाले आकाश में न जाने कितने महान्‌ पुरुषों ने अपने जीन की कथाएँ लिखी हैं। उन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्वयं अपना उपहास कराते हैं।

मेरा यह जीवन अनंत अभावों और बुराइयों से भरा हुआ है। फिर भी मित्रों तुम मुझसे यह कहते हो कि मेरे जीवन में जो कमियाँ हैं, जो मेरे साथ घटित हुआ है उसे मैं सबके सामने कह डालूँ|क्या तुम मेरी कहानी को सुनकर सुख प्राप्त कर सकोगे? मेरा मन तो खाली गागर के समान है, जिसमें कोई भाव नहीं है। कहीं तुम्हारा मन भी तो मेरी तरह भावों से खाली नहीं है और तुम मेरे भावों द्वारा अपने मन के खालीपन को भरना चाहते हो अर्थात्‌ ऐसा तो नहीं है कि मेरे खाली जीवन को देखकर तुम्हें सुख प्राप्त होगा।

काव्यांश 2 

यहं विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊं मैं।

भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं ।

उज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

मिता कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया। 

भावार्थ

कवि कहता है कि यह तो दुर्भाग्य की बात होगी कि सरल मन वाले की मैं हँसी उड़ाऊँ। मैं तो अभी तक स्वयं दूसरों के स्वभाव को समझ  नहीं पाया हूँ। मैं तुम्हारे सामने अपनी कमियाँ प्रकट करूँ या लोगों के छलकपटपूर्ण व्यवहार को एवं दुनिया से मुझे जो धोखे मिलें है उन्हें तुम्हें बताऊँ। मैं उन मधुर चाँदनी रातों की उज्ज्वल गाथा को कैसे गाऊँ , जिसमें हँसते -खिलखिलाते हुए प्रिया के साथ बातें होती थीं। उन निजी क्षणों का वर्णन मैं कैसे कर सकता हूँ? उन क्षणों को लोगों को बताने की कोई आवश्यकता नहीं है।

कवि अपनी आत्मकथा बताते हुए कहता है कि मुझे जीवन में वह सुख कहाँ मिला, जिसका स्वपन देखकर मैं जाग गया। सुख तो मेरी बाँहों में आने से पहले ही मुसकुराकर भाग गया अर्थात्‌ मेरी अभिलाषाएँ कभी सफल नहीं हुईं, मुझे कभी सुख की प्राप्ति नहीं हुई।

काव्यांश 3 

जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की?

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?

क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।’

भावार्थ

कवि अपनी प्रिया के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उसके लालिमायुक्त गालों को देखकर ऐसा लगता था जैसे प्रेम बिखेरती उषा उदित हो रही हो अर्थात्‌ ऐसा लगता था जैसे उषा भी अपनी लालिमा उसी से लिया करती थी। आज मैं उसकी ही यादों का सहारा लेकर अपने जीवन के रास्ते की थकान दूर करता हूँ अर्थात्‌ उसी की यादें मेरे थके हुए जीवन का सहारा बनीं।मेरे जीवन में सुख के ऐसे पल कभी नहीं आए, जिनसे तुम प्रेरित है सको।

इसलिए क्‍यों तुम मेरे जीवन की कहानी को खोलकर, उधेड़कर देखना चाहते हो। मेरे इस छोटे-से जीवन में अभावों से भरी बड़ी-बड़ी कथाएँ हैं। मैं अपने जीवन की उन सामान्य गाथाओं को कैसे कहूँ? मेरे लिए यही अच्छा रहेगा कि मैं दूसरे महान्‌ लोगों की कथाओं को सुनता रहूँ और अपने बारे में चुप रहूँ। भला तुम मेरी भोली-भाली आत्मकथा को सुनकर क्या प्रेरणी प्राप्त कर सकोगे? मेरा दुःख इस समय शांत है। वह अभी थककर सोया है। इसलिए अभी आत्मकथा को लिखने का उचित समय नहीं आया है।


Class 10 Hindi Chapter 4 Question Answer

क्षितिज – काव्य खंड – आत्मकथ्य – जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 1. कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?

उत्तर – कवि निम्नलिखित कारणों से आत्मकथा लिखने से बचना चाहता है : –

(1 ) आत्मकथा लिखने से प्रसाद जी को धोखा देने वाले मित्रों के विश्वासघात की भी कलई खुलेगी।

(2) आत्मकथा लिखते समय अपने अतीत का हर पन्ना खोलना होगा। जीवन से जुड़े दुखों,अभावों तथा असफलताओं एवं हृदयगत दुर्बलताओं का उल्लेख करना होगा। बीते समय के दुखों से पुनः व्यथित होना पड़ेगा। मानव का स्वभाव है, वह दूसरों के दुखों को देखकर आनंद लेता है, उसका उपहास उड़ाता है। कवि उससे बचना चाहता है।

(3) कवि अपनी प्रेमिका के साथ बिताए मधुर पलों को अपनी निजी पूँजी मानता है अतः आत्मकथा द्वारा उसे सार्वजनिक नहीं करना चाहता।
(4) कवि की व्यथाएँ थककर सो चुकी हैं। कवि आत्मकथा द्वारा उन्हें पुनः जगाना नहीं चाहता।


प्रश्न 2. आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ‘अभी समय भी नहीं’ कवि ऐसा क्यों कहता है?

उत्तर – ‘अभी समय भी नहीं’ कवि ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि कवि को लगता है कि उसने जीवन में अब तक कोई ऐसी उपलब्धि नहीं हासिल की है जो दूसरों को बताने योग्य हो तथा उसकी दुख और पीड़ा इस समय शांत है अर्थात् वह उन्हें किसी सीमा तक भूल गया है और इस समय उन्हें याद करके दुखी नहीं होना चाहता है। कवि को लगता है कि अभी उचित समय नहीं आया कि वह अपनी आत्मकथा कहे। साथ ही साथ लोगों को भी उसमें कुछ आनंद प्राप्त नहीं होगा।


प्रश्न 3. स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का क्या आशय है?

उत्तर – कवि के निराश जीवन में आज न तो कोई सुख है, न आशा। केवल अतीत की मधुर यादें तथा प्रियतमा के संग बिताए क्षणों की स्मृतियाँ उसके जीवन-यात्रा के लिए अवलंब बन गई हैं। इन्हीं सुखद स्मृतियों के सहारे शेष जीवन काटा जा सकता है। थके हुए यात्री के पाथेय (भोजन-सामग्री व जल आदि) के समान ये यादें उसके जीवन का आधार हो गई हैं।


प्रश्न 4. भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उत्तर  – (क) कवि ने अपने जीवन में प्रेम से भरे, जो मधुर सुख की कल्पना की थी, वह उसे कभी प्राप्त नहीं हुआ। वह प्रेमिका के संग प्रेमपूर्ण जीवन बिताने के स्वप्न लेता, किंतु उसके पूरा होने से पूर्व ही वह जाग जाता। उसे लगा वह प्रेमपाश में प्रेमिका को बाँध ही लेगा, किंतु वह करीब आकर भी मुस्कुरा कर दूर चली जाती। कहने का अभिप्राय यह है कि कवि को जीवन में दांपत्य सुख नहीं मिला।

(ख) कवि की प्रेयसी अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी है। उसके गाल इतने लालिमा युक्त और मतवाले हैं कि प्रेममयी उषा भी उसी से लाली ग्रहण करती है। कहने का अभिप्राय है कि कवि की प्रेयसी का सौंदर्य उषा की सुंदरता से भी बढ़कर है।

प्रश्न 5. ‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’- कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

उत्तर – कवि के जीवन में ऐसे सुखद क्षण भी आए थे, जब उसके जीवन में सुख की चाँदनी बिखरी थी। वह उन्मुक्त हँसी हँसता था, अपने मन की बात खुलकर कहता था। कवि उन मादक क्षणों, चाँदनी रातों का, मुक्त कंठ के हास-परिहास का तथा प्रेम भरी अनुभूतियों का वर्णन कैसे करे, क्योंकि वे सुख के क्षण अल्पजीवी व निजी थे। आत्मकथा लिखकर इस कहानी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यह कवि की निजी अनुभूतियाँ हैं, अतः इनकी गोपनीयता बनी ही रहनी चाहिए।


प्रश्न 6. ‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।


उत्तर
 – कविता की भाषा की विशेषताएँ-

(1) छायावादी शैली में रचित कविता है।

(2) छायावादी सूक्ष्मता के अनुरूप ही कवि ने ललित, सुंदर एवं नवीन शब्दों तथा बिंबों का प्रयोग किया है।

(3) एक तरफ़ कवि द्वारा यथार्थ की स्वीकृति है, तो दूसरी तरफ़ कवि की विनम्रता भी है।

(4) भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है।

(5) तत्सम शब्दों की बहुलता है। यथा स्वप्न

(6) इसमें ‘स्मृति बिंब’ का सहारा लिया गया है।

(7) कथात्मक शैली है।

(8) प्रेम व वेदना के भावों की प्रमुखता के कारण माधुर्य गुण प्रधान है।

(9) मुहावरेदार शैली है-‘कथा की सीवन को उधेड़ना’।

(10) भाषा में प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता का प्रयोग है। ‘पतझड़’ सूनेपन का प्रतीक है। ‘सुख’ के दो अर्थ हैं, पहला-भावनाशून्य व्यक्तियों को कवि की दुख भरी गाथा सुनकर प्रसन्नता होगी, दूसरा- संवेदनशील व्यक्तियों को यह करुण कहानी सुनकर क्या सुख मिलेगा अर्थात् वे दुखी ही होंगे।

प्रश्न 7. कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?

उत्तर – कवि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहता है कि जिस सुख का सपना देखते-देखते उनकी आँखें खुल गई, वे उसे प्राप्त न कर सके। जिससे मिलने, जिसे पाने की कामना और कल्पना करते रहे, वह उनके आलिंगन में आते-आते रह गया, अर्थात् उनका वह सुख का सपना टूट गया, वह साकार न हो सका। कवि अपनी प्रेयसी की सुंदरता को याद कर कह उठते हैं कि वह बहुत सुंदर थी। उसके लालिमायुक्त कपोलों की सुंदरता के आगे प्रातःकाल के सूर्योदय की लाली भी लज्जित हो जाती थी।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8. इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर – उत्तर कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की निम्नलिखित झलक मिलती है : –

• प्रसाद जी के जीवन में सुख नहीं था।

• उनमें एक तरफ़ कवि द्वारा यथार्थ की स्वीकृति है, तो दूसरी ओर एक महान कवि की विनम्रता भी।

• उनका जीवन निराशा, दुख व कष्टों से भरा था।

• वे सच्चाई प्रकट कर किसी का मन नहीं दुखाना चाहते थे।


प्रश्न 9. आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?

उत्तर – हम इन सभी महान व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे जैसे-डॉ० राजेंद्र प्रसाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, राणा प्रताप, भगत सिंह तथा स्वामी विवेकानंद। इन महान व्यक्तियों की आत्मकथा से हमें प्रेरणा मिलेगी तथा हम अच्छे नागरिक बन सकेंगे।

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